समाचार | अध्ययन में सूक्ष्म और नैनोप्लास्टिक कणों के अंतःस्रावी तंत्र को बाधित करने वाले प्रभाव सामने आए
वैज्ञानिक प्रमाण लगातार यह दर्शा रहे हैं कि प्लास्टिक के योजक लैंगिक हार्मोनों में हस्तक्षेप कर सकते हैं। रटगर्स विश्वविद्यालय की एक प्रयोगशाला के नए अध्ययन से पता चलता है कि प्लास्टिक स्वयं, विशेषकर मध्यम सांद्रता में सांस के जरिए लिए जाने पर, अंतःस्रावी तंत्र को भी बाधित कर सकता है और मानव स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है।
अनुसंधान की पृष्ठभूमि और निष्कर्ष
पिछले अध्ययनों में मुख्यतः प्लास्टिक को कठोर या लचीला बनाने के लिए उपयोग किए जाने वाले रसायनों, जैसे बिस्फेनॉल ए (BPA), पर ध्यान दिया गया है। इन अध्ययनों के कारण अधिक सुरक्षित प्लास्टिक योजक विकसित करने के प्रयास जारी हैं। हालांकि, रटगर्स विश्वविद्यालय के नवीनतम शोध ने एक नई बात सामने रखी है: सूक्ष्म और नैनोमीटर आकार के नायलॉन प्लास्टिक कण (पॉलियामाइड), जब मादा प्रयोगशाला चूहियों द्वारा सांस के जरिए लिए गए, तो उन्होंने अंतःस्रावी व्यवधान उत्पन्न किया और लैंगिक हार्मोन के स्तरों में परिवर्तन किए।
अध्ययन से संकेत मिलता है कि इन प्लास्टिक कणों का श्वसन के माध्यम से प्रवेश मोटापे की बढ़ती दरों और प्रजनन क्षमता में कमी सहित अनेक स्वास्थ्य समस्याओं की व्याख्या कर सकता है। रटगर्स विश्वविद्यालय के फार्मेसी स्कूल की सहायक प्रोफेसर और अध्ययन की प्रमुख लेखिका फोएबी स्टेपलटन ने कहा: “पिछला शोध लगभग पूरी तरह अंतःस्रावी तंत्र पर रासायनिक योजकों के प्रभावों पर केंद्रित रहा है, जबकि हमारा अध्ययन पहली बार दर्शाता है कि प्लास्टिक के भीतर मौजूद प्लास्टिसाइज़िंग रसायन नहीं, बल्कि प्लास्टिक कण स्वयं सीधे अंतःस्रावी व्यवधान पैदा करते हैं।”
अनुसंधान पद्धतियां और नवाचार
इस अध्ययन का एक अन्य नवाचार इसकी प्रायोगिक एक्सपोज़र पद्धति है। पिछले अध्ययनों में आमतौर पर जानवरों को इंजेक्शन या भोजन के माध्यम से प्लास्टिक कणों के संपर्क में लाया जाता था, जबकि इस अध्ययन ने मनुष्यों द्वारा सूक्ष्म और नैनोप्लास्टिक कणों को सांस के जरिए लेने की वास्तविक परिस्थिति का अनुकरण किया। शोध दल ने नायलॉन सूक्ष्मकणों (खाद्य-ग्रेड) को एक ऐसी विधि से एरोसोल बनाया, जिससे वे हवा के माध्यम से प्रयोगशाला चूहियों तक पहुंच सके, और यह सूक्ष्मप्लास्टिक कणों को सांस के जरिए लेने के रोजमर्रा के मानवीय अनुभव से काफी मिलता-जुलता था।
प्रयोग में शोधकर्ताओं ने पाउडर जितने महीन नायलॉन कणों का उपयोग किया और कणों को कंपन देकर हवा में उड़ाने के लिए सबवूफर का उपयोग किया, जिससे अंततः चूहे उन्हें सांस के जरिए ले सके। अध्ययन के विषय मादा चूहे थे और एक्सपोज़र की अवधि एकल 24-घंटे की थी।
अनुसंधान परिणाम और निहितार्थ
प्रारंभिक निष्कर्षों से संकेत मिलता है कि सांस के जरिए लिए गए सूक्ष्म और नैनोप्लास्टिक कण चूहों के फेफड़ों के विभिन्न भागों में जमा हुए, लेकिन उन्होंने फेफड़ों में महत्वपूर्ण सूजन उत्पन्न नहीं की। हालांकि, शोधकर्ताओं ने देखा कि चूहों की रक्तवाहिका कार्यक्षमता कुछ हद तक प्रभावित हुई और महिला हार्मोन 17-बीटा-एस्ट्राडियोल का स्तर कम हो गया।
यह अंतःस्रावी व्यवधान, विशेषकर लैंगिक हार्मोनों पर इसका प्रभाव, शारीरिक स्वास्थ्य पर दीर्घकालिक प्रतिकूल असर डाल सकता है। अध्ययन में यह भी पाया गया कि पर्यावरण में सूक्ष्मप्लास्टिक और नैनोप्लास्टिक कणों के दीर्घकालिक संपर्क से मानव स्वास्थ्य पर संभावित नकारात्मक परिणाम हो सकते हैं, विशेषकर बढ़ते गंभीर पर्यावरण प्रदूषण की पृष्ठभूमि में।
प्लास्टिक प्रदूषण के संभावित स्वास्थ्य जोखिम
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से प्लास्टिक का विभिन्न क्षेत्रों में व्यापक उपयोग हुआ है। रटगर्स विश्वविद्यालय के पिछले शोध के अनुसार, पिछले 60 वर्षों में प्लास्टिक का वैश्विक उत्पादन लगभग 9 अरब टन तक पहुंच गया है, जिसमें से लगभग 80% वायुमंडलीय परिस्थितियों से प्रभावित होकर धीरे-धीरे नग्न आंखों से अदृश्य कणों में टूट गया है। ये सूक्ष्मप्लास्टिक हवा में तैरते हैं और दैनिक जीवन में मनुष्यों द्वारा सांस के जरिए लिए जा सकते हैं।
मानव शरीर पर सूक्ष्मप्लास्टिक और नैनोप्लास्टिक कणों के स्वास्थ्य प्रभावों का अध्ययन अभी जारी है, लेकिन प्रोफेसर स्टेपलटन ने बताया कि बढ़ते शोध से यह स्पष्ट हुआ है कि प्लास्टिक के रासायनिक योजक अंतःस्रावी तंत्र को बाधित कर सकते हैं। यह विषय विश्वभर में व्यापक ध्यान आकर्षित कर रहा है।
प्रोफेसर स्टेपलटन ने कहा, “वर्तमान में संपर्क कम करने के उपाय बहुत सीमित हैं। हालांकि प्राकृतिक रेशों के कपड़े चुनकर या भोजन को प्लास्टिक कंटेनरों में रखने से बचकर हम संपर्क कम करने की कोशिश कर सकते हैं, लेकिन सांस में ली जाने वाली हवा में छोटे प्लास्टिक कण पहले से मौजूद हो सकते हैं।”
निष्कर्ष और भविष्य की दिशा
यह अध्ययन प्लास्टिक प्रदूषण के स्वास्थ्य प्रभावों को समझने के लिए एक नया दृष्टिकोण प्रदान करता है, विशेषकर स्वयं प्लास्टिक कणों के संभावित अंतःस्रावी-व्यवधानकारी प्रभावों के बारे में। भविष्य में अधिक शोध के साथ हम इन सूक्ष्मप्लास्टिक से उत्पन्न स्वास्थ्य जोखिमों का बेहतर आकलन और प्रबंधन कर सकेंगे।
समाचार स्रोत:
इंटरनेट से संकलित
लेखक LinkedIVF Teamप्रकाशित 2024-12-19
本文使用 AI 輔助整理;LinkedIVF 尚未記錄本篇的編輯審核,不構成醫療建議。
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समाचार | अध्ययन में माइक्रो- और नैनोप्लास्टिक कणों के अंतःस्रावी-विघटनकारी प्रभाव मिले
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वैज्ञानिक प्रमाण लगातार यह दर्शा रहे हैं कि प्लास्टिक के योजक लैंगिक हार्मोनों में हस्तक्षेप कर सकते हैं। रटगर्स विश्वविद्यालय की एक प्रयोगशाला के नए अध्ययन से पता चलता है कि प्लास्टिक स्वयं, विशेषकर मध्यम सांद्रता में सांस के जरिए लिए जाने पर, अंतःस्रावी तंत्र को भी बाधित कर सकता है और मानव स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है।
अनुसंधान की पृष्ठभूमि और निष्कर्ष
पिछले अध्ययनों में मुख्यतः प्लास्टिक को कठोर या लचीला बनाने के लिए उपयोग किए जाने वाले रसायनों, जैसे बिस्फेनॉल ए (BPA), पर ध्यान दिया गया है। इन अध्ययनों के कारण अधिक सुरक्षित प्लास्टिक योजक विकसित करने के प्रयास जारी हैं। हालांकि, रटगर्स विश्वविद्यालय के नवीनतम शोध ने एक नई बात सामने रखी है: सूक्ष्म और नैनोमीटर आकार के नायलॉन प्लास्टिक कण (पॉलियामाइड), जब मादा प्रयोगशाला चूहियों द्वारा सांस के जरिए लिए गए, तो उन्होंने अंतःस्रावी व्यवधान उत्पन्न किया और लैंगिक हार्मोन के स्तरों में परिवर्तन किए।
अध्ययन से संकेत मिलता है कि इन प्लास्टिक कणों का श्वसन के माध्यम से प्रवेश मोटापे की बढ़ती दरों और प्रजनन क्षमता में कमी सहित अनेक स्वास्थ्य समस्याओं की व्याख्या कर सकता है। रटगर्स विश्वविद्यालय के फार्मेसी स्कूल की सहायक प्रोफेसर और अध्ययन की प्रमुख लेखिका फोएबी स्टेपलटन ने कहा: “पिछला शोध लगभग पूरी तरह अंतःस्रावी तंत्र पर रासायनिक योजकों के प्रभावों पर केंद्रित रहा है, जबकि हमारा अध्ययन पहली बार दर्शाता है कि प्लास्टिक के भीतर मौजूद प्लास्टिसाइज़िंग रसायन नहीं, बल्कि प्लास्टिक कण स्वयं सीधे अंतःस्रावी व्यवधान पैदा करते हैं।”
अनुसंधान पद्धतियां और नवाचार
इस अध्ययन का एक अन्य नवाचार इसकी प्रायोगिक एक्सपोज़र पद्धति है। पिछले अध्ययनों में आमतौर पर जानवरों को इंजेक्शन या भोजन के माध्यम से प्लास्टिक कणों के संपर्क में लाया जाता था, जबकि इस अध्ययन ने मनुष्यों द्वारा सूक्ष्म और नैनोप्लास्टिक कणों को सांस के जरिए लेने की वास्तविक परिस्थिति का अनुकरण किया। शोध दल ने नायलॉन सूक्ष्मकणों (खाद्य-ग्रेड) को एक ऐसी विधि से एरोसोल बनाया, जिससे वे हवा के माध्यम से प्रयोगशाला चूहियों तक पहुंच सके, और यह सूक्ष्मप्लास्टिक कणों को सांस के जरिए लेने के रोजमर्रा के मानवीय अनुभव से काफी मिलता-जुलता था।
प्रयोग में शोधकर्ताओं ने पाउडर जितने महीन नायलॉन कणों का उपयोग किया और कणों को कंपन देकर हवा में उड़ाने के लिए सबवूफर का उपयोग किया, जिससे अंततः चूहे उन्हें सांस के जरिए ले सके। अध्ययन के विषय मादा चूहे थे और एक्सपोज़र की अवधि एकल 24-घंटे की थी।
अनुसंधान परिणाम और निहितार्थ
प्रारंभिक निष्कर्षों से संकेत मिलता है कि सांस के जरिए लिए गए सूक्ष्म और नैनोप्लास्टिक कण चूहों के फेफड़ों के विभिन्न भागों में जमा हुए, लेकिन उन्होंने फेफड़ों में महत्वपूर्ण सूजन उत्पन्न नहीं की। हालांकि, शोधकर्ताओं ने देखा कि चूहों की रक्तवाहिका कार्यक्षमता कुछ हद तक प्रभावित हुई और महिला हार्मोन 17-बीटा-एस्ट्राडियोल का स्तर कम हो गया।
यह अंतःस्रावी व्यवधान, विशेषकर लैंगिक हार्मोनों पर इसका प्रभाव, शारीरिक स्वास्थ्य पर दीर्घकालिक प्रतिकूल असर डाल सकता है। अध्ययन में यह भी पाया गया कि पर्यावरण में सूक्ष्मप्लास्टिक और नैनोप्लास्टिक कणों के दीर्घकालिक संपर्क से मानव स्वास्थ्य पर संभावित नकारात्मक परिणाम हो सकते हैं, विशेषकर बढ़ते गंभीर पर्यावरण प्रदूषण की पृष्ठभूमि में।
प्लास्टिक प्रदूषण के संभावित स्वास्थ्य जोखिम
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से प्लास्टिक का विभिन्न क्षेत्रों में व्यापक उपयोग हुआ है। रटगर्स विश्वविद्यालय के पिछले शोध के अनुसार, पिछले 60 वर्षों में प्लास्टिक का वैश्विक उत्पादन लगभग 9 अरब टन तक पहुंच गया है, जिसमें से लगभग 80% वायुमंडलीय परिस्थितियों से प्रभावित होकर धीरे-धीरे नग्न आंखों से अदृश्य कणों में टूट गया है। ये सूक्ष्मप्लास्टिक हवा में तैरते हैं और दैनिक जीवन में मनुष्यों द्वारा सांस के जरिए लिए जा सकते हैं।
मानव शरीर पर सूक्ष्मप्लास्टिक और नैनोप्लास्टिक कणों के स्वास्थ्य प्रभावों का अध्ययन अभी जारी है, लेकिन प्रोफेसर स्टेपलटन ने बताया कि बढ़ते शोध से यह स्पष्ट हुआ है कि प्लास्टिक के रासायनिक योजक अंतःस्रावी तंत्र को बाधित कर सकते हैं। यह विषय विश्वभर में व्यापक ध्यान आकर्षित कर रहा है।
प्रोफेसर स्टेपलटन ने कहा, “वर्तमान में संपर्क कम करने के उपाय बहुत सीमित हैं। हालांकि प्राकृतिक रेशों के कपड़े चुनकर या भोजन को प्लास्टिक कंटेनरों में रखने से बचकर हम संपर्क कम करने की कोशिश कर सकते हैं, लेकिन सांस में ली जाने वाली हवा में छोटे प्लास्टिक कण पहले से मौजूद हो सकते हैं।”
निष्कर्ष और भविष्य की दिशा
यह अध्ययन प्लास्टिक प्रदूषण के स्वास्थ्य प्रभावों को समझने के लिए एक नया दृष्टिकोण प्रदान करता है, विशेषकर स्वयं प्लास्टिक कणों के संभावित अंतःस्रावी-व्यवधानकारी प्रभावों के बारे में। भविष्य में अधिक शोध के साथ हम इन सूक्ष्मप्लास्टिक से उत्पन्न स्वास्थ्य जोखिमों का बेहतर आकलन और प्रबंधन कर सकेंगे।
समाचार स्रोत:
इंटरनेट से संकलित